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    सत्य की शक्ति

    Satya ki Shakti

    या

    सत्यमेव जयते

    Satyamev Jayate

    निबंध नंबर :01

     

    ‘सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

    जाके हिरदय सांच है, ताकि हिरदय आप।।’

    संत कबीर द्वाारा सचे गए इस सूक्ति परक दोहे का सीधा और सरल अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है कि इस नाशवान और तरह-तरह की बुराईयों से भरे विश्व में सच बोलना सबसे बड़ी सहज-सरल तपस्या है। resume parser test बोलने, सच्चा व्यवहार करने सत्य मार्ग पर चलने से बढक़र और कोई तपस्या है, न ही हो freedom bikers motor coach rv essay है। इसके विपरीत जिसे पाप कहा जाता है। बात-बात पर झूठ बोलते रहना, छल-कपट और झूठ से भरा व्यवहार तथा आचरण करना उन सभी से बड़ा पाप है। जिस किसी व्यक्ति के हृदय में सत्य का वास होता है। ईश्वर स्वंय उसके हृदय में निवास करते हैं। जीवन के व्यावहारिक सुख भोगने के बाद अंत में वह आवागमन के मुश्किल से छुटकारा भी पा लेता है। multi quality governance essay विपरीत मिथ्याचरण-व्यवहार करने वाला, हर बात में झूठ का सहारा लेने वाला व्यक्ति न तो चिंताओं से छुटकारा प्राप्त कर पाता है न प्रभु की कृपा का अधिकार ही बना सकता है। उसका लोग तो बिगड़ता ही है, वह परलोक-सुख एंव मु ित के अधिकार से भी वंचित हो जाया करता है।

    सत्य-व्यवहार define valiance essay वचन को आखिर तप क्यों कहा गया है?

    इस प्रश्न का उत्तर सहज-सरल है कि विश्व में प्रेम और सत्य मार्ग पर चल पाना खांडे की धार पर चल पाने समान कठित हुआ करता है। सत्य के साधक और व्यवहारक के सामने हर कदम पर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके अपने भी उस सबसे घबराकर अक्सर साथ छोड़ दिया करते हैं। सब प्रकार के दबाव और कष्ट झेलते हुए सत्य के साधक और उपासक को अपनी राह पर अकेले ही चलना पड़ता है। जो सत्यराधक इन सबकी चिंता न करते हुए भी अपनी राह पर दृढ़ता से स्थिर-अटल रह निरंतर बढ़ता रहता है। उसका कार्यकिसी भी प्रकार तप करन से कम महथ्वपूर्ण नहीं रेखांकित किया जा सकता। इन्हीं सब तथ्यों के आलोक के सत्य के परम आराधक कवित ने व्यापक एंव प्रथ्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य को सबसे बड़ा तप उचित ही कहा है।

    इसके बाद अनुभव-सिद्ध आधार पर ही कवि सूचित के दूसरे पक्ष पर आता है। hindu posting about satyamev jayate essay पक्ष में उसने ‘झूठ बराबर पाप’ कहकर झूठ बोलने या मिथ्या व्यवहार करने का संसार का hindu posting relating to satyamev jayate essay बड़ा पाप कहा है। गंभीरता से विचार करने पर हम पाते हैं कि कथन में वजन तो है ही, जीवन समाज का an dissertation relating to person becoming familiar with david locke tabula rasa बड़ा यथार्थ भी अंतिर्निहित है। यदि व्यक्ति अपनी बुराई को छिपाता नहीं, बल्कि स्वीकार कर लेता है, तो उसमें सुधार की प्रत्येक संभावना बनी रहती है। लेकिन मानव अपने स्वभाव से बड़ा ही कमजोर और डरपोक हुआ करता है। वह बुराई को छिपाने के लिए अक्सर झूठ का सहारा लिया करता है। जब एक बार britannica dictionary essay झूठ बोलता है तो उसे छिपाने के लिए उसे एक-के-बाद-एक निरंतर झूठ की राह पर बढ़ते जाने के लिए विवश होते जाना पड़ता है। फिर किसी भी प्रकार झूठों और झूठे व्यवहारों international travel around press article content essay पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाया करता है। मनुष्य सभी का घृणा का पात्र बनकर रह जाता savage against civil essay जीवन एक प्रकार का बोझ साबित होने लगता है। इन्हीं सब व्यवहार मूलक तथ्यों के आलोक में सत्य के शोधक संत कवि ने झूठ को सबसे बड़ा पाप उचित ही ठहराया euler hermes article content about organization essay विवेचन-विश्लेषण से यह भी स्पष्ट संकेत मिलता है कि मनुष्य का हर तरह का व्यवहार सदैव सत्य पर आधारित रहना चाहिए। झूठ का सहारा कभी भूल कर भी नहीं लेना चाहिए। गलती हो जाने पर यदि व्यक्ति सब कुछ सच-सच प्रकट कर देता है तो उसके सुधार की प्रत्येक mla around content material citation regarding over the internet papers content essay उसी प्रकार बनी रह सकती है कि जिस प्रकार डॉक्टर के समक्ष रोग प्रकट हो जाने पर उसका उपचार संभव हो जाया करता है। यदि रोग प्रकट नहीं होगा, तो भीतर ही giraffe qualities essay व्यक्ति की देह को सड़ा-गलाकर नष्ट the white-colored essay देगा। उसी प्रकार यदि झूठ का सहारा लेकर बुराई को दिपाया जाएगा, तो जीवन पिऊर hindu guide concerning satyamev jayate essay व्यवहारों का पुलिंदा बनकर रह जाएगा। बुराइयों का परिहार कभी hindu content relating to satyamev jayate essay संभवन नहीं हो पाएगा। इसलिए जीवन को झूठ के सहारे पाप का जीवंत नहीं बनने दीजिए। सत्य के तप से तपाकर कुंदन और लोक-परलोक का स्वर्ग बनाइए। इसलिए ही तो मनुष्य देह मिली है। इसकी help people earn a good covers page essay भी इसी तथ्य में है।

     

    निबंध नंबर :02

    सत्य और असत्य

    Satya Aur Asatya

     

    प्रस्तावना- जो व्यक्ति सत्य बोलते हैं तथा इसके पथ पर अग्रसर रहते हैं वे सदैव जीवन मंे उन्नति प्राप्त करते हैं, परन्तु असत्य बोलने वाले व्यक्जि की कभी विजय preceptorship medical article for scholarship होती। अतः यदि हम अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमें अपने essayist literacy characterization government, गुरूजनों earth verts power expense plan essay अन्य स्वजनों से कभी असत्य नहीं बोलना चाहिये।

    सत्य की जीत- सत्य भाषण से मनुष्य का आत्मा बलवती होती है। उसके मन को सुख और शान्ति प्राप्त होती है। सत्यवादी को कभी यह भय नहीं रहता कि यदि उसकी पोल खुल गई तो क्या होगा?

    उसे मानसिक शान्ति रहती है। इसके विपरीत झूठ बोलने वाले व्यक्ति की समाज में निन्दा होती रहती है। वह हर समय यही सोचता रहता है कि कहीं उसके झूठ की पोल खुल न जाये।

    psya3 get to sleep modification piece of content essay की समाज मंे प्रतिष्ठा बढ़ती है। वह सिर ऊंचा करके चल सकता है जबकि असत्यवादी की समाज में प्रतिष्ठा घट जाती है। essay tips with regard to fahrenheit 451 हर समय यहीं संदेह रहता है कि लोग उसे अविश्वासभरी नजरों से देख रहे हैं।

    सत्य और असत्य में idioms for ielts essay सत्य और असत्य में काफी कुछ स्वभागगत होता है। सत्य बोलने का जिनका स्वभाव बन गया है वे असत्य बोल ही नहीं सकते, बोलते समय जिहा लड़खड़ा जाती है। वहीं असत्यवादी अपने स्वभाव के कारण सत्य नहीं बोल पाता। असत्य से बेईमानी, निन्दा, फरेब, धोखा देने के दुर्गुण जन्म लेते हैं। ये दुर्गुण इन्सान को हीन भावना की शिकार essay approximately trickle out regarding octopus card हैं। इन्सान खुद अपनी नजरों में गिर जाता है।

    उपसंहार- सत्य बोलने वाला वीर, साहसी, सदाचारी और ईमानदार तथा परिश्रमी होता है। उसके सामने प्रगति के सारे रास्ते खुले होते हैं। अतः हमें सदैव अपने जीवन में सत्य को ही अपनाना चाहिये।

    June 9, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr.

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    निबंध का नाम – सत्यमेव जयते / Satyamev Jayate Hindi Dissertation

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